मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना - रामजी दौदेरिया
शीर्षक - मजहब सिखाता है आपस में बैर रखना कवि - रामजी दौदेरिया आज इंसान इंसान न रहा भाईचारा प्रेम हृदय में ज्ञान न रहा मजहब मजहब करते है मजहब के नाम पर लड़ते है मजहब सिखाता है अपनो को गैर करना मजहब सिखाता है आपस में बैर रखना पहले हम इंसान थे हम मजहब से अनजान थे हृदय में प्यार सच्चा था इंसानियत धर्म अच्छा था मजहब ने सिखाया इंसानियत की न खैर करना मजहब सिखाता है आपस में बैर रखना धर्म से अलग होकर तुम ने ये जो मजहब बनाए मजहब धर्म के लिए दिल में नफरत वसाए आओ एक हो जाए हम , सारे मजहब जलाए हम एक इंसानियत धर्म निभाए मजहब सिखाता हर काम धर्म बगैर करना मजहब सिखाता आपस में बैर रखना धर्म ही बचा कर रख पाएगा इंसानियत को मजहब से तो खोट पैदा होती इंसानी नियत को मजहब अगर इंसान को इंसान से जोड़ सकता तो पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश न बनता...