भारत का पहला इच्छामृत्यु मामला।
सोचिए, क्या गुजरी होगी उन मां बाप पर जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया होगा। भारत का पहला इच्छामृत्यु मामला मानवीय संवेदनाओं, कानून और चिकित्सा नैतिकता से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बहस का विषय बन गया। हरिश राणा गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, जो तेरह वर्ष पहले चंडीगढ़ में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे और PG (पेयिंग गेस्ट) मकान में रहते थे। उसी दौरान वे PG की चौथी मंज़िल की बालकनी से गिर गए। इस हादसे में उनके सिर में इतनी गहरी चोट आई कि वे कोमा की अवस्था में चले गए। न बोल पाते थे न ही हिल डुल पाते थे, तब से लेकर कई वर्षों तक वे अचेत अवस्था में रहे और केवल चिकित्सकीय उपकरणों तथा तरल आहार के सहारे उनका जीवन चल रहा था। हरिश के माता-पिता ने अपने बेटे के इलाज और देखभाल में तेरह वर्षों तक अथक प्रयास किया। उन्होंने अपनी आर्थिक क्षमता से कहीं अधिक खर्च किया और हर संभव उम्मीद के साथ बेटे की सेवा करते रहे। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि हरिश के ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है। इस स्थिति में परिवार के सामने एक कठिन और भावनात्म...