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होली एक परंपरागत त्यौहार।

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होली को हम अक्सर रंग, गुलाल और गुजिया तक सीमित कर देते हैं, लेकिन इस त्योहार की कुछ परतें ऐसी भी हैं, जिन पर कम ही चर्चा होती है। सबसे रोचक बात यह है कि प्राचीन भारत में होली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक “रीसेट बटन” की तरह थी। पुराने समय में इस दिन लोगों को व्यंग्य, कटाक्ष और खुलकर सच बोलने की छूट होती थी। गाँवों में फाग गाते समय सामाजिक विसंगतियों पर खुलकर तंज कसा जाता था। यह एक तरह से समाज की सफाई का तरीका था—बिना दुश्मनी बढ़ाए सच कह देने की परंपरा। लेकिन फाग की परंपरा अब विलुप्त होती जा रही है। एक और कम जानी गई बात यह है कि पुराने जमाने में होली के रंग औषधीय होते थे। टेसू (पलाश) के फूलों से बनाया गया केसरिया रंग त्वचा के लिए लाभकारी माना जाता था। हल्दी, चंदन और गुलाब के अर्क का प्रयोग शरीर को संक्रमण से बचाने के लिए किया जाता था। वसंत ऋतु में बदलते मौसम से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए रंगों में प्राकृतिक तत्व मिलाए जाते थे। होली का एक राजनीतिक पक्ष भी रहा है। मध्यकाल में कई शासक इस दिन प्रजा के साथ रंग खेलते थे, ताकि सत्ता और समाज के बीच की दूरी कम हो। यह एक प्रतीकात्...

भारत परमाणु शक्ति की राह में अमेरिका बना था रोड़ा

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इज़राइल आधिकारिक रूप से कहता है “हम ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे।” क्योंकि अगर ईरान परमाणु शक्ति बन गया, तो हमारे अस्तित्व पर खतरा होगा। अमेरिका भी नहीं चाहता कि ईरान परमाणु  शक्ति बने। आज जो देश परमाणु संपन्न नहीं है और वो परमाणु संपन्न होना चाहते हैं अमेरिका उसके लिए सबसे बड़ी अड़चन है अमेरिका नहीं चाहता कोई देश परमाणु संपन्न हो। सत्ययुग में कोई ऋषि-मुनि तपस्या करता था तो इन्द्र खुद व खुद टेंशन में आ जाता था, ऐसा ही कुछ हाल अमेरिका का है इसे पता नहीं क्या टेंशन हो जाती है। अमेरिका ने भारत को भी परमाणु बनाने से रोका था, अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत परमाणु शक्ति बनें इसके लिए उसने हर संभव कोशिश की थी अगर आज के नेता होते तो अमेरिका के सामने घुटने टेक देते उस समय हमारे नेता बहुत मजबूत विजन शक्ति वाले थे, वो कभी अमेरिका के आगे नहीं झुके। उन्होंने अमेरिका को आंखों में आंखें डाल कर जवाब दिया और भारत को परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्र बनाया। वो सच्चे राष्ट्रवादी नेता थे, आज के नेताओं की तरह डरपोक नहीं।  भारत ने 18 मई 1974 को पोखरण राजस्थान में प्रधा...

आज का हीरो संजू स्पेशल सैमसन

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स्टेडियम की भीड़ में कभी वह सिर झुकाए बैठा दिखा था। स्कोरबोर्ड उसकी खामोशी बयान कर रहा था और चारों तरफ सवाल तैर रहे थे—क्या अब वक्त निकल गया? छोटी सीरीज़ों में रन नहीं आए तो आलोचनाओं की आँधी चल पड़ी। मोबाइल स्क्रीन से लेकर मैदान की दर्शक दीर्घा तक, हर जगह फैसले सुनाए जा रहे थे। किसी ने कहा टीम से बाहर करो, किसी ने भविष्य पर विराम लगा दिया। लेकिन खेल केवल आंकड़ों से नहीं चलता, वह हिम्मत और इंतज़ार की कहानी भी लिखता है। संजू सैमसन ने भी शोर का जवाब शब्दों से नहीं, तैयारी से दिया। जब बल्ला कुछ मैचों में खामोश रहा, तब उन्होंने खुद को और मजबूत किया। नेट्स में घंटों पसीना बहाया, तकनीक सुधारी, मन को संभाला। क्योंकि असली खिलाड़ी वही है जो गिरकर भी अपने विश्वास को नहीं गिरने देता। फिर आया वह मुकाबला, जहां हर गेंद एक परीक्षा थी। दबाव इतना कि एक चूक सफर रोक सकती थी। लेकिन आज संजू की आंखों में घबराहट नहीं, भरोसा था। उन्होंने संयम को ढाल बनाया और आक्रामकता को हथियार। शॉट दर शॉट, रन दर रन, उन्होंने मैच की दिशा मोड़ दी। टीम लड़खड़ाई जरूर थी, पर उनके धैर्य ने उसे संभाल लिया। भारत सेमीफाइनल...

2026 एशियन इंडोर एथलेटिक्स चैम्पियनशिप और भारत का गौरव तेजास्वी शंकर

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भारत में खेलों की बात होती है तो सबसे पहले नाम आता है क्रिकेट का। गली-गली में बच्चे बैट लेकर दौड़ते दिख जाएंगे, टीवी चैनलों पर क्रिकेट की चर्चा 24 घंटे चलती रहती है। लेकिन इसी देश की मिट्टी में ऐसे खिलाड़ी भी जन्म लेते हैं, जो बिना शोर-शराबे के, बिना बड़ी सुर्खियों के, भारत का तिरंगा दुनिया के मंच पर लहराकर लौटते हैं। ऐसी ही एक कहानी है तेजास्वी शंकर की, एक ऐसे एथलीट की, जिन्होंने 2026 में चीन की धरती पर तिरंगा लहरा कर इतिहास रच दिया। शायद ही किसी को पता हो। चीन की धरती पर फरवरी 2026 में चीन के तियानजिन शहर में आयोजित 2026 एशियन इंडोर एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में एशिया के सर्वश्रेष्ठ एथलीट एकत्र हुए। ट्रैक और फील्ड के 26 से अधिक इवेंट्स में कड़ी प्रतिस्पर्धा हुई। इसी प्रतियोगिता में पुरुष हेप्टाथलॉन में तेजास्वी शंकर ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता। हेप्टाथलॉन कोई साधारण प्रतियोगिता नहीं है, यह ताकत, फुर्ती, सहनशक्ति और मानसिक दृढ़ता की परीक्षा है। सात अलग-अलग इवेंट्स में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करना पड़ता है। तेजास्वी ने न केवल गोल्ड जीता, बल्कि राष्ट्रीय इंडोर रिकॉर्ड भी तो...

जाति मुक्त सामाज का निर्माण सिर्फ सामाज कर सकता है। रामजी दौदेरिया

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जाति मुक्त सामाज का निर्माण सिर्फ समाज कर सकता है। महाराष्ट्र के सौंदला गांव ने जाति मुक्त सामाजिक बदलाव की मिसाल पेश की है। यहां की ग्रामसभा ने जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित कर स्वयं को “जाति मुक्त” बनाने का संकल्प लिया।  सार्वजनिक स्थानों पर समान अधिकार मंदिर, पानी के स्रोत, सामुदायिक भवन, स्कूल आदि सभी स्थानों पर हर व्यक्ति को बराबर अधिकार देने की प्रतिबद्धता जताई गई। सामाजिक कार्यक्रमों में बदलाव शादी-ब्याह, भोज और धार्मिक आयोजनों में अलग-अलग पंगत या जाति के आधार पर बैठने की परंपरा खत्म कर दी गई है। जाति का सार्वजनिक उल्लेख खत्म किया गया सामाजिक कार्यक्रमों में जातिसूचक पहचान का प्रयोग खत्म किया गया है।  शिक्षित युवाओं ने जागरूकता अभियान चलाए, बैठकों में चर्चा की और विकास को जाति से ऊपर रखने का आग्रह किया। यदि कोई व्यक्ति जातिगत भेदभाव करेगा तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी और ग्रामसभा में मुद्दा उठाया जाएगा। सामाज तो चाहता है जात-पात खत्म हो, हर नागरिक को एक सामान अधिकार मिले। क्या ऐसा सच में संभव है, वास्तविक सच्चाई तो यह है कि हमारा सरकारी प्रशासनि...

AI Summit गलगोटिया यूनिवर्सिटी विवाद पर राय। रामजी दौदेरिया

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गलगोटिया यूनिवर्सिटी से जुड़ा AI Summit विवाद सिर्फ एक प्रवक्ता के द्बारा मिडिया को दी गई गलत जानकारी की चूक भर नहीं है, यह हमारी सरकार और हमारे शिक्षण संस्थान के सिस्टम पर एक जोरदार तमाचा है, जो हमारी सरकार तथा सरकार द्बारा चलाए जा रहे संस्थागत संस्कारों की सच्चाई को उजागर करती है।  इस प्रकरण में जो बात सबसे अधिक चुभी, वह यह है कि विवाद के बाद लीपापोती करना अपनी सफाई में संवाद करना। इन सब से देश को और अधिक कठोरता प्रतीत हुई है। विवाद के बाद सफाई देने से बेहतर था अपनी ग़लती को स्वीकारना, आत्मचिंतन करना और देश को भरोसा दीलाना कि भविष्य में इस तरह के कार्य नहीं होंगे जिससे देश का सिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झुकें। बयानबाजी करना, सुर्खियों में बने रहने की चाहत और पीआर आदि से अधिक प्रभाव हमेशा एक ईमानदार विनम्रता का पड़ता है। दरअसल समस्या सारी उस मानसिकता की है जिससे हम धाराप्रवाह अंग्रेज़ी, आत्मविश्वासी देहभाषा और मंचीय चमक का आकलन करते हैं। अच्छी अंग्रेजी बोलने को ज्ञान, डेवलप या विकसित नहीं कहते है। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम अंग्रेजी अच्छी बोले या अंग्...

सोशल मीडिया की ताकत से खड़ा हुआ आंदोलन।

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एक शख्स, सोशल मीडिया, और खड़ा हो गया बड़ा जन आंदोलन। झारखंड, जिला रामगढ़ के बूढ़ाखाप क्षेत्र में स्थित आलोक स्टील प्लांट पिछले कुछ समय से स्थानीय लोगों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। यह प्लांट स्टील और स्पंज आयरन उत्पादन से जुड़ा औद्योगिक इकाई है, जो क्षेत्र में रोजगार और औद्योगिक विकास का एक स्रोत माना जाता है।  2004 से यह प्लांट चल रहा है लेकिन  विवाद तब ज्यादा बढ़ गया जब प्लांट के विस्तार की चर्चा शुरू हुई और सोशल मीडिया पर एक स्थानीय व्यक्ति सुरेंद्र महतो का विडियो वायरल हुआ, जिससे स्थानीय आंदोलन का कारण बना और यह मुद्दा अधिक चर्चा में आया है, स्थानीय लोगों का कहना है कि उत्पादन प्रक्रिया के दौरान धूल, राख और विभिन्न गैसें निकलती हैं। इनमें सूक्ष्म कण, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें शामिल हो सकती हैं।  इससे खेतों पर राख जमती है, हवा में धूल बढ़ती है और सांस लेने में परेशानी महसूस होती है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रदूषण का असर खेती, पानी और स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लंबे समय तक धूल और प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से अस्थमा, खा...