होली एक परंपरागत त्यौहार।
होली को हम अक्सर रंग, गुलाल और गुजिया तक सीमित कर देते हैं, लेकिन इस त्योहार की कुछ परतें ऐसी भी हैं, जिन पर कम ही चर्चा होती है।
सबसे रोचक बात यह है कि प्राचीन भारत में होली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक “रीसेट बटन” की तरह थी। पुराने समय में इस दिन लोगों को व्यंग्य, कटाक्ष और खुलकर सच बोलने की छूट होती थी। गाँवों में फाग गाते समय सामाजिक विसंगतियों पर खुलकर तंज कसा जाता था। यह एक तरह से समाज की सफाई का तरीका था—बिना दुश्मनी बढ़ाए सच कह देने की परंपरा। लेकिन फाग की परंपरा अब विलुप्त होती जा रही है।
एक और कम जानी गई बात यह है कि पुराने जमाने में होली के रंग औषधीय होते थे। टेसू (पलाश) के फूलों से बनाया गया केसरिया रंग त्वचा के लिए लाभकारी माना जाता था। हल्दी, चंदन और गुलाब के अर्क का प्रयोग शरीर को संक्रमण से बचाने के लिए किया जाता था। वसंत ऋतु में बदलते मौसम से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए रंगों में प्राकृतिक तत्व मिलाए जाते थे।
होली का एक राजनीतिक पक्ष भी रहा है। मध्यकाल में कई शासक इस दिन प्रजा के साथ रंग खेलते थे, ताकि सत्ता और समाज के बीच की दूरी कम हो। यह एक प्रतीकात्मक संदेश था कि त्योहार सबको बराबर कर देता है।
यह भी कम लोग जानते हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों में होली की परंपराएँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं—कहीं लट्ठमार होली, कहीं फूलों की होली, तो कहीं सिर्फ लोकगीतों की होली।
असल में, होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि समाज, स्वास्थ्य, राजनीति और लोकसंस्कृति के संगम का उत्सव है—जिसे हम जितना जानते हैं, उससे कहीं अधिक गहराई उसमें छिपी है।
खुशियों का त्योहार होली की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
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