2026 UGC का नियम और विवाद । रामजी दौदेरिया
SC/ST वर्ग क्या वास्तव में सवर्ण वर्ग से कभी पीड़ित था, या अब पीड़ित है, या आगे उन्हें सवर्णों द्बारा पीड़ित किया जा सकता है? सवाल आप पर छोड़ते है?
UGC का नया नियम असल में है क्या?
पहले समझो UGC क्या है?
UGC
University Grants Commission
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग
भारत सरकार की एक केंद्रीय संस्था है।
इसका काम है देश की यूनिवर्सिटी और कॉलेजों की उच्च शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रित करना।
UGC ने जनवरी 2026 में एक नया नियम लागू किया है, जिसका नाम है —
“Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026”
उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संरक्षण नियम, 2026”
नियम है कॉलेज और यूनिवर्सिटी में किसी भी छात्र के साथ धर्म, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र, दिव्यांगता आदि के आधार पर भेदभाव न हो। कानूनी लिखित रूप से “किसी भी छात्र” के लिए है।
लेकिन मुख्य मकसद व्यावहारिक और संरचनात्मक रूप से फोकस पिछड़े वर्गों पर ज़्यादा है।
सब जानते हैं आज पिछड़ा वर्ग कौन है ?
इस नियम की ज़मीनी हक़ीक़त SC, ST के साथ OBC को भी “जातिगत भेदभाव” की श्रेणी में विशेष रूप से शामिल किया गया है।
शिकायत तंत्र सुरक्षा ढांचा संवेदनशीलता दिशानिर्देश, ये सब पिछड़ा वर्ग को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किए गए हैं। क्योंकि व्यवहारिक रूप से शिकायतें ज़्यादातर पिछड़े वर्गों से आने की संभावना है। और संरक्षण तंत्र भी उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखता है।
नये नियम के हिसाब से संस्थानों को क्या करना होगा?
अब हर कॉलेज / यूनिवर्सिटी को अनिवार्य रूप से समान अवसर केंद्र बनाने होंगे।
यह केंद्र भेदभाव की शिकायत सुनेगा और तुरंत कार्यवाही करेगा।
यानि अगर SC/ST/OBC वर्ग के छात्र को लगे कि उनके साथ गलत हो रहा है, तो वह सीधे यहाँ शिकायत कर सकेगा।
UGC नियम द्वारा शिकायत की सुनवाई के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की गई है।
शिकायत मिलने के बाद 24 घंटे के अंदर सुनवाई करनी होती है। 15 दिन के अंदर जांच पूरी करके 7 दिन के अंदर कार्यवाही कुल मिला कर 22 दिन के अंदर कार्यवाही और सजा हो जाएंगी।
UGC ने यह नियम इसलिए बनाया है ताकि शिकायत लंबित न रहे पीड़ित को जल्दी न्याय और राहत मिले । सवाल यहीं है पीड़ित होंगे कौन?
व्यवहारिक रूप से “पीड़ित” मुख्यतः
SC, ST और OBC वर्ग के छात्र होंगे
क्योंकि जातिगत भेदभाव की परिभाषा
नियम में विशेष रूप से:
SC/ST/OBC वर्ग को ध्यान में रखकर लिखी गई है।
सामान्य / सवर्ण वर्ग की स्थिति क्या चिंताजनक होने वाली है ?
सवर्ण वर्ग के लिए यह साबित करना कि
“मेरे साथ भेदभाव हुआ”
कानूनी रूप से कठिन है,
खासकर जाति के आधार पर। क्योंकि SC/ST वर्ग को जाति के आधार पर कानून में पहले से ही पीड़ित माना जाता है। क्या अब इस नये नियम से सवर्ण वर्ग के लिए बड़ा संकट खड़ा हो सकता है ?
सीधा सा मतलब, नियम में लिखा है
पीड़ित — कोई भी छात्र, असली हकीकत
कानून के ढांचे और अमल में
पीड़ित — मुख्यतः पिछड़े वर्ग के छात्र।
अर्थात SC, ST, OBC वर्ग के छात्रों की सुनवाई सुनिश्चित है, तथा सवर्ण वर्ग के छात्रों की सुनवाई सुनिश्चित नहीं है।
यहीं से इस नियम पर विरोध शुरू होता है।
सवर्ण वर्ग के छात्रों की चिंता यह है कि:
अब OBC + SC + ST — तीनों जातिगत भेदभाव की श्रेणी में हैं, अगर कोई सवर्ण वर्ग का छात्र किसी बहस में बोल दे, किसी शैक्षणिक मुद्दे पर सवाल उठा दे या किसी शिकायत में फँसा दिया जाए तो उस पर झूठा जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया जा सकता है।
क्योंकि सवर्ण छात्रों के पास
न आरक्षण है न अतिरिक्त कोई छूट
न कोई विशेष संरक्षण।
तो सवाल उठता है सवर्ण छात्र
अब हर बहस में संभावित आरोपी हैं।”
इस कानून से सवर्ण छात्रों में डर इसलिए पैदा हो गया क्योंकि शैक्षणिक असहमति वैचारिक बहस, सामान्य विवाद को भी “जातिगत भेदभाव” की शिकायत में बदला जा सकता है, मतलब उन्हें पिछड़े वर्ग के छात्रों द्बारा झूठा अपराधी आसानी से बनाया जा सकता है। अब शिक्षा का माहौल संवाद से डर की ओर जाएगा।
समान अवसर केंद्र एक अच्छा विचार है,
लेकिन सवाल यह है—
क्या वहाँ निष्पक्ष लोग होंगे?
क्या झूठी शिकायत पर भी कार्रवाई होगी?
क्या दोनों पक्षों को समान रूप से सुना जाएगा?
तो सवर्ण वर्ग की ओर से जवाब है “नहीं”। क्योंकि बहुत जल्दबाजी में कार्यवाही होगी, सवर्ण छात्रों को झूठा फंसाया जा सकता है लेकिन झूठी शिकायत करने वाले पर कोई कार्यवाही नहीं होगी मतलब एक दम सीधा है।
यह केंद्र न्याय का मंच नहीं बल्कि डर का कार्यालय बन कर रह जाएगा। नियम एक तरफा काम करेगा ऐसा सवर्ण समाज का मानना है।
सवर्ण वर्ग क्या चाहता है?
@ भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट हो
@ जांच प्रक्रिया पारदर्शी हो
@ झूठी शिकायत पर सख्त सज़ा हो
@ शिक्षा संस्थान डर से नहीं, विश्वास से चलें
निष्कर्ष UGC का कानून
एक वर्ग को सुरक्षा और दूसरे वर्ग को संदेह के कटघरे में खड़ा कर दे तो वह समानता नहीं, असंतुलन पैदा करता है। सवर्ण वर्ग की यह आवाज़ विरोध नहीं, संतुलन की माँग है। क्योंकि “न्याय वही है,
जिसमें किसी को बिना दोष के दोषी न ठहराया जाए।
— रामजी दौदेरिया
लेखक/कवि
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