संविधान, गणतंत्र और आज का भारत ✍️ रामजी दौदेरिया
26 जनवरी :
संविधान, गणतंत्र और आज का भारत ——————————————
भारत के इतिहास में 26 जनवरी का दिन स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उस संकल्प, संघर्ष और संविधान की विजय का प्रतीक है, जिसने भारत को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया।
15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, लेकिन तब देश के पास अपना संविधान नहीं था। लगभग 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन की कठोर मेहनत के बाद संविधान सभा ने संविधान तैयार किया।
26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हुआ और भारत एक गणराज्य बना। इस दिन से देश में शासन जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चलने लगा।
हर नागरिक को मतदान का अधिकार मिला और कानून की दृष्टि में सभी समान हुए।
गणतंत्र का अर्थ है —
“जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन।” लेकिन सवाल यह है कि जमीनी स्तर पर इस कथन में कितनी सत्यता है।
आज, जब हम 26 जनवरी मनाते हैं, तो प्रश्न उठता है—
क्या चुनें हुए जन प्रतिनिधि उस संविधान की आत्मा के साथ खड़े हैं, जिसकी शपथ उन्होंने ली थी?
संविधान की आत्मा और वर्तमान यथार्थ
भारत का संविधान समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय की बात करता है।
पर आज का भारत कई मोर्चों पर तनाव से गुजर रहा है। विचारधाराओं के नाम पर टकराव, असहमति को देशद्रोह से जोड़ने की प्रवृत्ति, और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उठते सवाल तथा समाज में बढ़ता विभाजन, धर्म के नाम पर जाति के नाम पर, हाल ही UGC द्बारा आया नियम विभाजन का जीता जागता उदाहरण है।
यह वही भारत है जहाँ संविधान ने हर नागरिक को बोलने, पूछने और विरोध करने का अधिकार दिया था। लेकिन आज सत्ता द्बारा लोकतंत्र का केंद्रीकरण होता नजर आ रहा है, लोकतंत्र द्बारा चुनें हुए प्रतिनिधि आज जनता के मुद्दों को उठाने की जगह दबाते नजर आ रहे हैं। संस्थाओं की स्वतंत्रता, संसद में स्वस्थ बहस पर आज सवाल उठते नज़र आ रहे है। आज संसद में बहस का समय घट रहा है, तथा आम आदमी के मुद्दों पर संसद में बिल्कुल बहस नहीं होती। बेरोज़गारी पर बहस नहीं होती, मंहगाई पर तथा गिरते रूपए पर बहस नहीं होती, भ्रष्टाचार के लिए कठोर कानून बने उस पर बहस नहीं होती, बढ़ती जनसंख्या के समाधान पर बहस नहीं होती, किसान के मुद्दों ( फसल की कीमत ) पर बहस नहीं होती, पानी,पर्यावरण, जंगल, पहाड़ बचाने पर संसद में कोई चर्चा नहीं होती, शिक्षा तथा चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर संसद में चर्चा नहीं होती, देश की सुरक्षा को लेकर जितनी चर्चा संसद में होनी चाहिए नहीं होती।
आज संसद चुनें हुए जन प्रतिनिधियों का टाइम पास ( समय की बर्बादी ) का अड्डा बन चुका है ऐसा लगता है। सवाल खड़ा होता है क्या संसद में मूल मुद्दों को भूलाने के लिए जानता का ध्यान भटकाने के लिए, आम आदमी को गुमराह करने के लिए बेवजह पुराने मुद्दे उठाए जाते हैं, और घंटों घंटों तक उन पर बहस होती है और यह सब होता है जनता के पैसों पर। जनता के टैक्स के पैसे बर्बाद किए जाते हैं और समाधान कुछ नहीं निकलता।
जनता के टैक्स से संसद चलती है लेकिन जब जनता द्बारा चुनें गए जन प्रतिनिधि जनता के मूल मुद्दे संसद में नहीं उठाते तो लोकतंत्र का हनन होता है।
हम गणतंत्र को सिर्फ मनाते हैं, जीते नहीं हैं। यदि संविधान की आत्मा कमजोर हुई, तो वह दिन दूर नहीं होगा जब गणतंत्र, तानाशाही शासन में बदल जाएगा।
इसलिए आज सबसे बड़ा राष्ट्रधर्म
संविधान की रक्षा, लोकतंत्र की मजबूती और आम नागरिक के अधिकार है।
गणतंत्र केवल राष्ट्रीय उत्सव नहीं, जनता की जिम्मेदारी है। और इस जिम्मेदारी को जनता को निभाना ही पड़ेगा, संविधान, गणतंत्र के लिए आवाज उठानी ही पड़ेगी।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था—
“संविधान कितना भी अच्छा हो, उसे चलाने वाले लोग अच्छे न हों, तो वह असफल हो जाएगा।”
संविधान हमें अधिकार देता है समानता का लेकिन इसी देश में नियम कानून ऐसे बनाएं जाते है जो समाज में असमानता फैलाते हैं।
यही संविधान का दुरुपयोग है।
✍️ रामजी दौदेरिया
लेखक/कवि
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
जय लोकतंत्र 🙏🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें