तमसा नदी का पुनर्जीवन जन आंदोलन। रामजी दौदेरिया

जहां सरकारी योजनाएं दम तोड़ती हुई नज़र आती है, वहीं आम नागरिक कोई योजना शुरू करते हैं तो उसे अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लेते हैं। ऐसी ही एक योजना शुरू हुई तमसा नदी को साफ करने की और देखते ही देखते यह योजना एक बड़ा जन आंदोलन बन गई। 

“ तमसा ” गंगा नदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है। जो पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुख्य रूप से आजमगढ़, अम्बेडकर नगर, अयोध्या जिलों से होकर गुजरती है और आगे जाकर गंगा नदी में मिल जाती है।
तमसा नदी सिर्फ एक साधारण नदी नहीं है, इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व बहुत बड़ा है। मान्यता है कि जब भगवान श्रीराम वनवास पर अयोध्या से निकले थे, तो उन्होंने पहली रात तमसा नदी के किनारे बिताई थी। इसलिए यह नदी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पहले यह नदी साफ, चौड़ी और जल से भरपूर थी और आसपास के गांवों की जीवनरेखा मानी जाती थी। लेकिन समय के साथ-साथ कई कारणों से नदी की हालत खराब हो गई नदी में सिल्ट (मिट्टी) जमा होने लगी बारिश के बाद मिट्टी जमा होती गई और नदी उथली हो गई।
लोगों ने नदी किनारे निर्माण शुरू कर दिया जिससे अतिक्रमण बढ़ा। गांव और कस्बों का कचरा नदी में जाने लगा। जिससे नदी का जल प्रवाह कम होने लगा और प्राकृतिक जल स्रोत बंद हो गए नतीजा यह रहा कि नदी कई जगह नाले जैसी दिखने लगी और पानी रुकने लगा। नदी सूखने और प्रदूषण बढ़ने से खेती और पानी की समस्या बढ़ी। साल दर साल बीतते गए और नदी की हालत खराब हो गई।

वर्षों बाद शुरू हुई यह पहल जन जागरण और जनता के सहयोग से सफल हुई। 
आजमगढ़ जिला प्रशासन और स्थानीय लोगों ने मिलकर नदी बचाने का निर्णय लिया। जिले की 111 ग्राम पंचायतों ने एक साथ काम शुरू किया। गांव-गांव से लोगों ने श्रमदान किया, फावड़ा, कुदाल से खुद सफाई शुरू की।
नदी में जमा मिट्टी (सिल्ट) हटाई गई।
कचरा, प्लास्टिक और जलकुंभी साफ की गई। नदी किनारे से अतिक्रमण हटाया गया।
घाट और किनारों की सफाई की गई। नदी किनारे पेड़ लगाए गए। जागरूकता अभियान चलाया गया।
यह अभियान इसलिए भी खास था, इसमें न तो बड़ी मशीनों उपयोग हुआ और न ही भारी बजट पर निर्भर था। 
इस अभियान से नदी का जल प्रवाह बेहतर हुआ। पानी की गुणवत्ता सुधरी। खेती और सिंचाई को लाभ हुआ। जैव विविधता (मछली, पौधे आदि) में सुधार हुआ। धार्मिक गतिविधियां फिर से बढ़ीं।
इसे “नदी पुनर्जीवन का मॉडल” बताया जा रहा है। इसे दूसरे क्षेत्रों को भी अपनाना चाहिए। 
यह उदाहरण दिखाता है कि अगर स्थानीय लोग जिम्मेदारी लें तो बिना भारी मशीन और बड़े बजट के भी नदी का पुनर्जीवन संभव है।

— रामजी दौदेरिया 
     लेखक कवि 























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