जाति मुक्त सामाज का निर्माण सिर्फ सामाज कर सकता है। रामजी दौदेरिया
जाति मुक्त सामाज का निर्माण सिर्फ समाज कर सकता है। महाराष्ट्र के सौंदला गांव ने जाति मुक्त सामाजिक बदलाव की मिसाल पेश की है। यहां की ग्रामसभा ने जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित कर स्वयं को “जाति मुक्त” बनाने का संकल्प लिया।
सार्वजनिक स्थानों पर समान अधिकार
मंदिर, पानी के स्रोत, सामुदायिक भवन, स्कूल आदि सभी स्थानों पर हर व्यक्ति को बराबर अधिकार देने की प्रतिबद्धता जताई गई। सामाजिक कार्यक्रमों में बदलाव
शादी-ब्याह, भोज और धार्मिक आयोजनों में अलग-अलग पंगत या जाति के आधार पर बैठने की परंपरा खत्म कर दी गई है।
जाति का सार्वजनिक उल्लेख खत्म किया गया सामाजिक कार्यक्रमों में जातिसूचक पहचान का प्रयोग खत्म किया गया है।
शिक्षित युवाओं ने जागरूकता अभियान चलाए, बैठकों में चर्चा की और विकास को जाति से ऊपर रखने का आग्रह किया।
यदि कोई व्यक्ति जातिगत भेदभाव करेगा तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी और ग्रामसभा में मुद्दा उठाया जाएगा।
सामाज तो चाहता है जात-पात खत्म हो, हर नागरिक को एक सामान अधिकार मिले। क्या ऐसा सच में संभव है, वास्तविक सच्चाई तो यह है कि हमारा सरकारी प्रशासनिक ढांचा जात-पात के इर्द-गिर्द ही घूमता है। जहां सरकारी योजनाएं आर्थिक आधार पर नहीं, जाति के आधार पर ही बनाई जाती हो, योजनाओं का लाभ लेने के लिए गरीब प्रमाण पत्र नहीं, जाति प्रमाण पत्र चलता हो। ऐसे में सवाल यही है जाति से मुक्त हो पाना क्या मुमकिन है।
भारत में जाति मुक्त सामाज का निर्माण करना इसलिए भी मुश्किल है कि जाति केवल एक कुल नाम ( सर नेम ) तक सीमित नहीं है बल्कि जाति के आधार पर हर एक व्यवस्था का आधार टिका होता है। जाति की जड़ें इतनी गहरी है कि जाति मुक्त सामाज का निर्माण होना नामुमकिन सा लगता है। फिर भी सामाज के बदलाव से संभव हो सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि सरकार में बैठे नेता खुद नहीं चाहते कि जाति मुक्त सामाज बने, क्योंकि जात-पात में बंटने से उनकी राजनीति चलती है और उन्हें जातियों में वोट बैंक नजर आता है।
✍️ रामजी दौदेरिया
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