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आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रूप से शिव क्या है? रामजी दौदेरिया

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शिव को आध्यात्मिक, दार्शनिक, प्रकृति, ऊर्जा, संतुलन और आत्मज्ञान का प्रतीक माना जाता हैं। शिव को संहार और परिवर्तन का देवता कहा जाता है। शिव वह परम चेतना या ब्रह्मांड की ऊर्जा हैं, जो हर जगह मौजूद है। योग और ध्यान में शिव को आदियोगी कहा जाता है, यानी योग के प्रथम गुरु। शिव केवल सृष्टि के विनाशक नहीं, बल्कि पुराने को समाप्त करके नए सृष्टि के कर्ता है। आध्यात्मिक दृष्टि से शिव का अर्थ “शून्य” है, यानी वह अवस्था जहां अहंकार, इच्छा और भ्रम समाप्त हो जाते हैं। जब मन शांत और स्थिर हो जाता है, उसे शिव की अवस्था कहा जाता है। आज भी विज्ञान मानता है कि शिव (शून्य) की अवस्था में ओम् की ध्वनि के साथ ध्यान (Meditation) करने से तनाव कम होता है, दिमाग शांत रहता है और सोचने की शक्ति बढ़ती है। मन पूरी तरह शांत, अहंकार रहित और सत्य तथा ज्ञान से जागरूक हो जाता है। इसी जागरूकता की अवस्था को शिव की तीसरी आंख का प्रतीक माना जाता है। यानि जब व्यक्ति अज्ञान और भ्रम से ऊपर उठता है, तब उसकी “तीसरी आंख” खुली मानी जाती है। विज्ञान कहता है कि पूरा ब्रह्मांड ऊर्जा और कंपन (vibration) से बना है। शिव को उसी अनंत ऊर्...